रात में सूरज को तरसता हूँ,
दिन में धूप
से तड़पता हूँ
आखिर क्या होगा मेरा.....?
मै हूँ कहाँ इस
यात्रा में....?
सोचता हूँ तो पाया
मुझे
ना
मंजिल का पता है
ना पहचान है,
ना रास्ते में हूँ
ना
सराय में,
मंजिल भी सोचती होगी
ये भी
अजीब नादान है!
दिन में धूप
से तड़पता हूँ
आखिर क्या होगा मेरा.....?
मै हूँ कहाँ इस
यात्रा में....?
सोचता हूँ तो पाया
मुझे
ना
मंजिल का पता है
ना पहचान है,
ना रास्ते में हूँ
ना
सराय में,
मंजिल भी सोचती होगी
ये भी
अजीब नादान है!
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